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मौत की पटरियों पर ‘वोटों’ की फसल, सुशासन के दावों की उड़ती धज्जियां, राया की जमीनी हकीकत

Gargachary Times 18 February 2026, 18:22 33 views
Mathura
मौत की पटरियों पर ‘वोटों’ की फसल, सुशासन के दावों की उड़ती धज्जियां, राया की जमीनी हकीकत
राया धर्मनगरी के विकास, ‘अमृत काल’ और सुशासन के दावों के बीच राया कस्बे की सूरज गोंगा रेलवे रोड पर एक ऐसी बस्ती बसी है, जहाँ जिंदगी हर पल मौत से आंख-मिचौली खेलती है। रेलवे ट्रैक और मुख्य मार्ग के बीच खसरा संख्या 6 की संकरी पट्टी पर दर्जनों ‘लोहा पीटने वाले परिवार फटे तिरपालों के नीचे वर्षों से गुजर-बसर कर रहे हैं। यह सिर्फ गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, राजनीतिक स्वार्थ और संवैधानिक अधिकारों के खुले उल्लंघन की जमीनी तस्वीर है। कागजी पुनर्वास का सफेद झूठ यहां देखने को मिला ज़ब वर्ष 2017 में एसडीएम महावन की रिपोर्ट में दावा किया गया कि परिवारों को आवास देकर हटा दिया गया है। लेकिन लगभग 9 वर्ष बीत जाने के बाद भी ये लोग आज भी खुले आसमान के नीचे जिंदगी मौत के बीच जीवन यापन कर रहे है हैं। अब सवाल उठता है—कागजों में पुनर्वास किसका हुआ? रेलवे की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना पूर्वोत्तर रेलवे का कहना है कि अतिक्रमण रेलवे सीमा से बाहर है, जबकि राजस्व रिकॉर्ड में भूमि ‘रेलवे चौकी’ दर्ज है। विभागों के इस टकराव में फंसे हैं सिर्फ गरीब परिवार। संवैधानिक अधिकारों का हनन संविधान का अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है। लेकिन पटरियों के किनारे बच्चों का खेलना और हर पल ट्रेन दुर्घटना का खतरा इस अधिकार की खुली धज्जियां उड़ाता है। वोट के लिए पहचान, सुरक्षा के लिए अनजान नेताओं ने आधार और वोटर कार्ड तो बनवा दिए, मगर छत और सुरक्षा देने की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली। वोट बैंक की ‘गंदी राजनीति’ बनाम बुनियादी हक पिछले एक दशक में राया नगर पंचायत की राजनीति में इन परिवारों का इस्तेमाल वोट बैंक के तौर पर हुआ। चुनाव के समय पहचान, बाकी समय उपेक्षा—यही इनकी किस्मत बना दी गई।पहचान पत्र की राजनीति वोटर बनाना जरूरी था, इंसान मानना नहीं। सुविधाओं से आज भी बंचित है लोहार स्वच्छ पेयजल नहीं शौचालय नहीं बिजली कनेक्शन नहीं रात में महिलाओं/बच्चों की सुरक्षा शून्य ‘स्वच्छ भारत’ के नारों के बीच यहां खुले में शौच और गंदगी रोज की मजबूरी है। बचपन पर मंडराता ‘काल’ इन बच्चों के पास खेलने का मैदान नहीं—रेलवे पटरी ही उनका आंगन है। एक चूक, एक तेज रफ्तार ट्रेन… और जिंदगी खत्म। अगर कल कोई हादसा होता है, तो जिम्मेदार कौन? प्रशासन, रेलवे या वे नेता जिन्होंने इन्हें यहां बसाया ? , मथुरा: क्या जिले में इन परिवारों के पुनर्वास के लिए जमीन का छोटा सा टुकड़ा भी नसीव नहीं? नगर पंचायत सीमा में होते हुए भी पानी, बिजली, शौचालय की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती ये सिर्फ चुनावों मै बोट बैंक के रूप मै प्रयोग करने के बाद कोई सुध लेने वाला नहीं SDM महावन/मांट: 2017 की रिपोर्ट पर कार्रवाई कब? जनप्रतिनिधि — क्या इन नागरिकों के लिए सुरक्षित छत की कोई योजना दे पाएंगे या ये सिर्फ वोट तक ही सीमित हैं? ❓ कड़वा सच क्या ये भारतीय नागरिक नहीं हैं? क्या इन्हें गरिमा से जीने का अधिकार नहीं? या फिर गरीबी ही इनका सबसे बड़ा अपराध है? जब तक प्रशासन और राजनीति की आंखें नहीं खुलतीं, तब तक राया की ये पटरी सिर्फ लोहे की नहीं, बल्कि व्यवस्था की असफलता की भी ‘मौत की पटरी’ बनी रहेगी।यहां के लोग बताते है सेकड़ो बार नगर पंचायत शिकायत लेकर जाते है लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो पाती दुत्कार कर भगा दिया जाता है आखिर ये
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