एनजीटी ने कथित अवैध वृक्ष कटान और पर्यावरण उल्लंघनों पर मांगी रिपोर्ट
Gargachary Times
13 March 2026, 18:55
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Delhi
नई दिल्ली: राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने उत्तर प्रदेश में चल रहे एक बड़े प्रोजेक्ट में कथित रूप से वृक्षों की कटाई और वनस्पति नष्ट किए जाने के आरोपों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
यह मामला ओरिजिनल एप्लिकेशन नंबर 649/2025 – उपेन्द्र शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के रूप में 13 मार्च 2026 को एनजीटी की प्रधान पीठ के समक्ष सूचीबद्ध हुआ था। इस मामले में आवेदक की ओर से सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी उपस्थित हुए।
सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल के समक्ष मुख्य रूप से परियोजना स्थल पर कथित अवैध वृक्ष कटान तथा बड़े पैमाने पर वनस्पति नष्ट किए जाने के आरोपों पर विचार किया गया।
जिला वन अधिकारी (DFO) की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने पूर्व में स्थल का निरीक्षण कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि स्थल पर पेड़ों के ठूंठ (stumps) नहीं पाए गए, हालांकि समिति ने यह स्वीकार किया कि उस क्षेत्र में महत्वपूर्ण मात्रा में वनस्पति साफ की गई है।
ट्रिब्यूनल ने अपने अवलोकन में स्पष्ट किया कि ठूंठ का न मिलना इस बात का निर्णायक प्रमाण नहीं है कि पेड़ों की कटाई नहीं हुई। ट्रिब्यूनल ने सुझाव दिया कि स्थल से हटाए गए पेड़ों की संख्या का वैज्ञानिक आकलन सैटेलाइट चित्रों तथा अन्य तकनीकी साधनों की सहायता से किया जा सकता है। इसके लिए परियोजना स्थल की वनस्पति घनत्व की तुलना आसपास के क्षेत्रों से की जा सकती है।
रिकॉर्ड पर प्रस्तुत सैटेलाइट चित्रों से यह संकेत मिलता है कि वर्ष 2016 से 2025 के बीच क्षेत्र में हरित आवरण (vegetation cover) में उल्लेखनीय कमी आई है, जिससे उस क्षेत्र में संभावित पर्यावरणीय क्षति को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न हुई है।
पीठ ने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि झाड़ियाँ और छोटे पौधे (shrubs and bushes) भी बिना विधिक अनुमति के नहीं हटाए जा सकते, जिससे वनस्पति हटाने का यह मुद्दा विधिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है।
जांच में सहयोग के लिए राजस्व अधिकारियों को निर्देश
पर्यावरणीय क्षति की वास्तविक सीमा निर्धारित करने के उद्देश्य से ट्रिब्यूनल ने राजस्व अधिकारियों को वन विभाग के साथ पूर्ण सहयोग करने का निर्देश दिया ताकि उस सटीक स्थान और भूमि क्षेत्र की पहचान की जा सके जहाँ कथित रूप से वनस्पति नष्ट की गई है।
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि पूर्व में प्रभावित भूमि की सीमाओं और क्षेत्रफल का निर्धारण करने के प्रयासों में राजस्व अधिकारियों का पर्याप्त सहयोग प्राप्त नहीं हुआ था।
जिला वन अधिकारी द्वारा दायर हलफनामे में यह भी सुझाव दिया गया कि पेड़ों के नुकसान तथा वनस्पति परिवर्तन की वास्तविक सीमा निर्धारित करने के लिए सैटेलाइट आधारित विश्लेषण के माध्यम से ‘फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया’ (Forest Survey of India) से तकनीकी सहायता ली जा सकती है।
‘अनंतम प्रोजेक्ट’ की पर्यावरणीय अनुपालना भी जांच के दायरे में
वृक्ष कटान के आरोपों के अतिरिक्त ट्रिब्यूनल ने “अनंतम प्रोजेक्ट” से संबंधित पर्यावरणीय अनुपालन (environmental compliance) के मुद्दों की भी समीक्षा की। यह परियोजना तीन सेक्टरों में विभाजित बताई गई है।
सुनवाई के दौरान यह गंभीर चिंता व्यक्त की गई कि परियोजना के लिए स्थापित किए जाने वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) वर्तमान में संचालन में नहीं हैं। जानकारी के अनुसार 700 KLD तथा 300 KLD क्षमता वाले दो STP कार्यरत नहीं पाए गए।
पर्यावरणीय स्वीकृति (Environmental Clearance) की शर्तों के अनुसार परियोजना में टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट (tertiary treatment plant) स्थापित करना भी अनिवार्य था। ट्रिब्यूनल ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया कि वह परियोजना प्रवर्तक द्वारा इन शर्तों के अनुपालन की स्थिति का सत्यापन करे तथा छह सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
इसके अतिरिक्त पीठ ने पर्यावरणीय शमन योजना के अंतर्गत 35 हेक्टेयर भूमि पर वृक्षारोपण किए जाने की शर्त के पालन की स्थिति के बारे में भी स्पष्टीकरण मांगा।
नए आरोप और प्रक्रिया संबंधी घटनाक्रम
सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि इस मामले में “गंभीर और चौंकाने वाले स्वरूप के नए तथ्य” सामने आए हैं, जिन्हें एक अंतरिम आवेदन (Interim Application) के माध्यम से ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।
पीठ ने निर्देश दिया कि उक्त आवेदन की प्रतियां सभी पक्षकारों को उपलब्ध कराई जाएं ताकि वे उस पर अपना उत्तर प्रस्तुत कर सकें।
सुनवाई के दौरान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और परियोजना प्रवर्तक के बीच कथित “बैक-चैनल कम्युनिकेशन” के आरोप भी लगाए गए, जिनकी आगे की कार्यवाही में जांच की जा सकती है।
इस बीच कुछ प्रतिवादियों ने अपना उत्तर दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिस पर ट्रिब्यूनल ने उन्हें चार सप्ताह का समय प्रदान किया।
मामले पर पर्यावरण समूहों और स्थानीय नागरिकों की नजर
यह मामला पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय निवासियों के बीच भी विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि इसमें वन संरक्षण, पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन तथा बड़े विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय शासन (environmental governance) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं।
ट्रिब्यूनल ने संबंधित प्राधिकरणों को निर्देश दिया है कि वे उठाए गए मुद्दों पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें। इन रिपोर्टों के प्राप्त होने के बाद मामले को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।