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जामा मस्जिद केस में वाद बिंदु तय करने की हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप की मांग, एएसआई ने अपना पक्ष रखने को मांगा समय, अगली सुनवाई 26 को

Gargachary Times 13 September 2025, 20:24 196 views
Mathura
जामा मस्जिद केस में वाद बिंदु तय करने की हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप की मांग, एएसआई ने अपना पक्ष रखने को मांगा समय, अगली सुनवाई 26 को
इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की कोर्ट में शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्मभूमि शाही ईदगाह मस्जिद मामले की करीब दो घंटे तक सुनवाई चली। शाही ईदगाह मस्जिद पक्ष द्वारा केवल प्रतिनिधि वाद को ही सुने जाने और अन्य को स्टे किए जाने की मांग पर हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप एडवोकेट ने आपत्ति दर्ज कराई। साथ ही जामा मस्जिद मामले में वाद बिंदु तय करने की मांग की, लेकिन भारतीय पुरातत्व विभाग ने अपना जवाब दाखिल करने के लिए कोर्ट से समय मांग लिया। अब अगली सुनवाई 26 सितंबर को होगी। हिंदू पक्षकार श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने बताया, श्रीकृष्ण जन्मभूमि शाही ईदगाह मस्जिद मामले में कोर्ट ने पहले प्रतिनिधि वाद तय कर दिया था। इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट से मांग की थी कि केवल प्रतिनिधि वाद को सुना जाए और अन्य को स्टे कर दिया जाए। इस पर हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप एडवोकेट ने अपनी आपत्ति जताई और मुस्लिम पक्ष की मांग को खारिज किए जाने को लेकर कोर्ट में एक प्रार्थना पत्र भी दाखिल किया। महेंद्र प्रताप सिंह ने कोर्ट से जामा मस्जिद मामले में वाद बिंदु तय करने की मांग करते हुए मजबूती के साथ अपना पक्ष रखा, पर इस मामले में भारतीय पुरातत्व विभाग ने अपना जवाब दाखिल करने के लिए कोर्ट से समय मांग लिया। एक अन्य हिंदू पक्षकार ने प्रतिनिधि वाद का गजट भी पूरे देश के प्रमुख समाचार पत्रों प्रकाशित कराने की मांग न्यायालय में रखी गई। उन्होंने बताया कि सभी पक्षों के सुनने के बाद कोर्ट ने सुनवाई की अगली तारीख 26 सितम्बर निर्धारित की है। - ये दर्ज कराई गईआपत्ति - केस संख्या 17 में किए आदेश की बाइडिंग केस संख्या 13 नंबर पर लागू नही होती है। - केस संख्या सबसे पहले अलग ग्राउंड पर दाखिल किया गया था, लिहाजा 18 जुलाई का आदेश इस पर प्रभावी नहीं माना जाएगा - सभी केस एकत्र कर एक साथ सुनने के आदेश किए गए थे, प्रतिनिधि वाद उससे अलग था। -केस संख्या 13 और 17 की प्रकृति अलग अलग है, लिहाजा दोनों को साथ साथ सुना जाना अति आवश्यक है - मुस्लिम पक्ष द्वारा जो आपत्ति दर्ज की गई वह अवैधानिक है और उसका यहां कोई औचित्य नहीं बनता है। जो गलत आशय से दाखिल की गई है, जिसका मकसद केस का लंबा खींचने का है। मुस्लिम पक्ष प्रार्थना पत्र को भारी जुर्माने के साथ निरस्त किया जाना आवश्यक है। और केस को स्टे करने का कोई भी पर्याप्त कारण नहीं है। वाद संख्या 17 के अलावा अन्य केसों चलना आवश्यक है।
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